रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय भगवंत मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि धर्म का मूल वस्तु-त्याग नहीं, दोष-त्याग है। उन्होंने कहा कि पाप या पुण्य का उदय मायने नहीं रखता, यदि विवेक जागृत है तो जीवन सही दिशा में चलता है।
महाराजश्री ने कहा कि गुणों का विकास तभी संभव है जब दोषों का नाश हो। उपवास और दान तभी सार्थक हैं जब उनके पीछे आसक्ति ना हो। धर्म का संबंध आहार नहीं, विचार और भावों की शुद्धता से है।
उन्होंने कहा कि क्रोध छोड़ेंगे तो क्षमा आएगी। संयम लेने से नहीं, बल्कि भावों के शुद्धिकरण से ही गुणों की वृद्धि संभव है। परमात्मा से सच्ची प्रार्थना यही होनी चाहिए कि विवेक सदैव जागृत रहे।
