लोककला की साधना से आकाशवाणी तक पहुंचे भरतलाल हरिन्द्र

साल्हेवारा। वनांचल के ग्राम रामपुर से लोककला की साधना शुरू करने वाले भरतलाल हरिन्द्र ने अपनी रचनाओं और गायन से छत्तीसगढ़ी संस्कृति को समृद्ध किया। गीतकार, गायक, वादक और रंगकर्मी के रूप में उन्होंने लोककला को जीवन का हिस्सा बनाया और अपनी प्रतिभा को आकाशवाणी रायपुर तक पहुंचाया।

11 दिसंबर 1958 को रामपुर में जन्मे भरतलाल ने आठवीं तक शिक्षा के बाद कृषि को व्यवसाय बनाया। महज 16 वर्ष की उम्र में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी में बेंजो वादक के रूप में कला यात्रा शुरू की। बाद में धुरवाराम मरकाम के लोक कला मंच ‘मया के फूल’ से जुड़े और करीब सात वर्षों तक गायन, वादन व अभिनय किया।

आकाशवाणी रायपुर में स्वर परीक्षण के बाद उन्होंने लोकगायिका दुखिया बाई के साथ अपने लिखे गीत प्रस्तुत किए। ‘संझा के बेरिया’, ‘कुंआ के पानी’, ‘ये भारत के माटी’ और ‘आ दुनों संग मा’ उनकी चर्चित रचनाएं हैं। वर्ष 1988 में उन्होंने रामपुर में सांस्कृतिक संस्था ‘फुलवारी’ की स्थापना की।

उनकी रचना ‘कुंआ के पानी, कुंवासी लागे’ आज भी चर्चित है। उनकी रचनाओं को अनुराग शर्मा, महादेव हिरवानी और विवेक शर्मा समेत कई कलाकारों ने स्वर दिया है। फिल्म निर्माता-निर्देशक सतीश जैन ने भी उनकी एक रचना को फिल्म में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है।

वर्तमान में वे ‘गुरु कृपा मानस मंडली, रामपुर’ का संचालन कर रहे हैं और तुलसी मानस प्रतिष्ठान की जिला इकाई के उपाध्यक्ष हैं। ग्रामीण परिवेश से निकलकर आकाशवाणी तक पहुंची उनकी यात्रा युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा है।