विवेकानंद नगर में हुई नवपद ओलीजी के दूसरे दिन सिद्ध पद की आराधना
रायपुर। विवेकानंद नगर में नवपद ओलीजी के दूसरे दिन सिद्ध पद की आराधना की गई। श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में उपाध्याय भगवंत आध्यात्म योगी महेंद्र सागरजी महाराज साहब ने कहा कि सिद्धपद आत्मा की शुद्ध अवस्था है। एकदम शुद्ध अवस्था अर्थात जिसमें किसी प्रकार की मलीनता नहीं है। संसार में हमारी आत्मा के साथ राग, द्वेष, मोह बंधे हुए हैं। इनके कारण ही कर्म बंधे हुए हैं। कर्म के कारण शरीर बंधा हुआ है। कुटुंब, परिवार, संपत्ति आदि बंधी हुई है। बंधनों के चक्कर में इस प्रकार से हम बंधे हुए हैं।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि सबसे बड़ा बंधन शरीर रूपी जेल का है। कर्म का कारण हमारा राग, द्वेष, मोह है। राग, द्वेष, मोह का कारण हमारा अज्ञान व मिथ्यात्व है। इस प्रकार से पूरा चक्र है। कर्म बंधन के कारण संसार में परिभ्रमण चलते रहता है। हमें अनेक प्रकार के शरीर मिलते हैं। अनेक प्रकार के स्थान मिलते हैं। आत्मा वही रहती है लेकिन आत्मा अनेक प्रकार के शरीर व स्थान में जाती है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि कुछ जीव ऐसे हैं उन्होंने अपने आप को इस परिभ्रमण से मुक्त कर लिया। बाहर से मुक्त होकर सिर्फ कर्म रहित आत्मा बन गए। इन्हें हम सिद्ध परमात्मा कहते हैं। शुद्ध परमात्मा ने बाहर की मालीनता से अपनी आत्मा को शुद्ध किया। हम सिद्ध पद की आराधना चाहते हैं। अपनी आत्मा को भी सिद्ध आत्मा जैसा बनाना होगा। कर्म बंधन को समाप्त करना है। हमारे भीतर अनंत ज्ञान शक्ति है लेकिन यह योग्यता हमारी दब गई है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
मोहनी कर्म मोह हमारी शक्ति को गलत जगह में लगा देता है। सही ज्ञान के द्वारा मोहिनी कर्म को खत्म करना है। हम यदि आत्म बल से मजबूत हो जाएंगे तो मोह खत्म हो जाएगा। जागृत होकर ही मोह को हराया जा सकता है। मोहनी कर्म हमें बार-बार संसार में भटकाता है। एक गति से दूसरे गति में भटकाव बना रहता है। जीव घातीय और अघातीय कर्मों का छय करके अपनी आत्मा को शुद्ध कर सिद्ध परमात्मा बनता है।
