रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचनमाला के दौरान उपाध्याय प्रवर मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि स्वार्थी व्यक्ति परमार्थ को नहीं समझ सकता। आत्मकल्याण के लिए मोक्ष साधना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्वार्थ बढ़ने से धर्म से दूरी बढ़ती है। हम झूठे ‘स्व’ को सच्चा मान बैठे हैं, जबकि असली ‘स्व’ आत्मा है। साधना से ही आत्मशुद्धि संभव है। धर्म सीमित नहीं, निरंतर बढ़ते रहने वाला पुरुषार्थ है।
महाराजश्री ने कहा कि बाहरी धन से बड़ी संपत्ति सन्मति है। सही ज्ञान से ही धर्म में रुचि और आत्मकल्याण संभव है। धर्म नापतौल कर नहीं, समर्पण से

