डोंगरगांव जनपद के ग्राम घोरदा में हरे-भरे पेड़ों की अवैध कटाई ने ना सिर्फ पर्यावरण प्रेमियों को झकझोरा है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर भी बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में 6 आम के पेड़ और एक दुर्लभ कहवा (इमरती) लकड़ी का पेड़ बिना अनुमति काटा गया है। मामले की गंभीरता को समझते हुए ग्रामीणों ने लिखित शिकायत डोंगरगांव एसडीएम श्रीकांत कोर्राम, तहसीलदार पी.एल. नाग और जिला कलेक्टर को सौंपी है, लेकिन एक हफ्ता गुजर चुका है और जांच अब भी ‘आदेश’ की बाट जोह रही है।
पटवारी-आरआई लापता, ग्रामीण परेशान
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस क्षेत्र में यह पेड़ कटाई हुई है, वहां के जिम्मेदार पटवारी प्रशांत सिंह ठाकुर और राजस्व निरीक्षक रामजी साहू मौके पर अब तक नहीं पहुंचे। जब उनसे जवाब मांगा गया तो “हमें ऊपर से आदेश नहीं मिला” कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या कानून व्यवस्था अब ‘ऊपर से आदेश’ के इंतजार में पर्यावरण की बलि चढ़ने देगी?
रसूख के साए में खामोश पंचायत
ग्रामीणों का कहना है कि वे खुलकर कुछ बोलने से डर रहे हैं। हालांकि कोई खुलकर नाम नहीं ले रहा, लेकिन दबी जुबान में सबकी उंगलियां जनपद सभापति एवं भाजपा नेता उमेश साहू की ओर उठ रही हैं। “कटाई उनके इशारे पर हुई,” ऐसा गांव में चर्चा है, लेकिन उनके रसूख के कारण लोग चुप्पी साधे हैं।
ग्राम सरपंच और सचिव से जब इस बाबत सवाल किया गया तो दोनों ने एक सुर में कहा, “हमें शिकायत मिली है, लेकिन कार्रवाई अब तक नहीं हुई।”
तो क्या पंचायत भी दबाव में है या फिर अपनी जिम्मेदारी से आंखें फेर चुकी है?
जनपद सभापति का इनकार, पर सवाल बरकरार
जब जनपद सभापति उमेश साहू से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए कहा, “मुझे जानबूझकर फंसाया जा रहा है, मेरा इस कटाई से कोई लेना-देना नहीं है।”
लेकिन सवाल यह है कि अगर ऐसा नहीं है, तो जांच क्यों रुकी हुई है? प्रशासन क्यों निष्क्रिय बैठा है?
प्रशासनिक चुप्पी से गहराया शक
एसडीएम श्रीकांत कोर्राम ने कहा कि “शिकायत मिली है, जांच की जाएगी,” लेकिन अब तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी स्थल पर नहीं पहुंचा है। यह स्थिति यह संकेत दे रही है कि शायद मामला कहीं ‘ऊपर’ से दबाया जा रहा है।
क्या हरे पेड़ों की कटाई पर रसूखदारों की छांव?
क्या जन आवाजें ताकतवर दीवारों से टकरा कर खामोश हो जाएंगी?
यह केवल पर्यावरण की नहीं, व्यवस्था की भी हत्या है!
यदि समय रहते निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घटना आने वाले दिनों में शासन और प्रशासन दोनों की साख पर गहरा दाग छोड़ सकती है।
